लोग यहाँ

इक मुखौटा लगाये फिरते हैं लोग यहाँ
राज़ दिल में छिपाये फिरते हैं लोग यहाँ

नीम की छाँव जैसे रिश्ते थे आज वहीं
झूठ के घर बनाये फिरते हैं लोग यहाँ

भीड़ में भी अकेले हैं सब इस पार खड़े
राह पलकें बिछाये फिरते हैं लोग यहाँ

ढूँढ लायें ख़ुशी वो शायद ये आस लिए
शाम महफ़िल सजाये फिरते हैं 

– आयुषी गुप्ता

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