भारतीय सैन्य बल (Indian Armed Forces)

नमस्कार मित्रों!

आज फिर से आप सबसे बात करने का बहुत मन हुआ सो इस लेख से कर रहा हूँ | ये लेख, एक लेख भी है और एक खुला पत्र (open letter) भी | ये खुला पत्र उन सभी लोगों के नाम है जो इस भारत-भूमि पर जन्में हैं और आगे जन्मेंगे | आज का विषय सामान्यतः सैन्य बलों (armed forces) और विशेषकर भारतीय सैन्य बलों (Indian Armed Forces) को लेकर है | शस्त्रों के प्रमाण मनुष्य की उत्पत्ति के आरम्भिक काल से ही मिलते हैं,और सैन्य-शक्ति के अर्जन के प्रमाण सभ्यता के आरम्भिक काल से | शस्त्रों का आविष्कार आत्मरक्षा के लिए किया गया था | शस्त्र सभी प्रकार के हिंसक प्राणियों से रक्षा का साधन हैं | परंतु सैन्यबल विशेषकर मनुष्य की मनुष्य से रक्षा का साधन हैं | सेनाएँ हिंसक पशुओं से बचने के लिए नहीं बनाई जाती हैं,वे केवल शत्रु-मनुष्यों से बचने के लिए बनाई जाती हैं | हाँ,हाल में ये सैन्यबल प्राकृतिक-आपदाओं में बचाव और राहत कार्य के लिए भी इस्लेमाल होने लगे हैं | इसपर भी इनके गठन का मूलोद्देश्य मनुष्य की मनुष्य से रक्षा ही है |

एक जटिल प्रश्न यह है कि मनुष्य को मनुष्य से रक्षा क्यूँ और किसलिए चाहिए? इसका एक कारण तो यह है कि मनुष्य बड़ा महत्वाकांक्षी है | वह अपने लाभ के लिए दूसरे का अहित करने से भी नहीं चूकता | ये लोभ-लालच मनुष्य जैसे बुद्धिमान जीव
को ख़तरनाक बना देते हैं | अपने लोभ में मनुष्य किसी का भी अहित कर सकता है | बिना जाने-बूझे अहित करता हो तो बात और है लेकिन मुश्किल तो ये है कि मनुष्य सब जानकर भी बाज़ नहीं आता,और इससे ख़तरा और बढ़ जाता है | इस कारण परस्पर अविश्वास और भय का उत्पन्न होना स्वाभाविक है | यह अविश्वास और भय ही कारण है स्वजातीय की स्वजातीय से रक्षा का | मनुष्य का बुद्धिमान होकर भी विवेकहीन होना ही परस्पर अविश्वास और भय का कारण बनता है | सैन्यबल  इसी विवेकहीनता से सम्भावित क्षति के प्रतिरोधक हैं |

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पिछले कुछ दिनों में भारतीय सैन्यबलों पर कई लोग सवाल खड़े करते रहे हैं,कमाल ये है कि सवाल भी वो कर रहे हैं जो ख़ुद एक बवाल हैं | कुछ लोग सेना पर सवाल करते हुए यहाँ तक कह गए कि ‘सेना को “Sacred Cow” क्यूँ बनाकर रखा है’ | ये लोग राष्ट्रवाद (Nationalism) को ज़हरीला कहने से भी न चूके | अब कोशिशें ये जारी हैं कि “देशभक्ति” (Patriotism) को भी एक गाली के रूप में देखा जाए | ये सब दुःखद है,दुःखद इसलीए कि इन लोगों ने कभी ये वाक्य न पढ़ा,न सुना और न
जानने का प्रयास किया कि “माता भूमिः पुत्रोऽहम् पृथिव्याः” क्यूँ कहा जाता है | भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रश्न करने की स्वतंत्रता देती है | ध्यान इस बात पर दें कि “स्वतंत्रता” देती है,”स्वच्छंदता” नहीं | जो लोग प्रश्न कर रहे हैं उनको उत्तर भी मिलना चाहिए | भई लोग सवाल तो जवाब की इच्छा से ही पूछते हैं न! तो इनके प्रश्नों का पहला उत्तर तो यह है कि सैन्यबल कभी आम नागरिक (civilians) को उत्तरदायी (accountable) नहीं होते | सेनाएँ अपने सेनाध्यक्ष/सेनापति को जवाबदेह होती हैं | भारत की सभी सेनाओं के सर्वोच्च सेनाध्यक्ष भारत के महामहिम राष्ट्रपति होते हैं | इसलिए सेनाएँ जवाब राष्ट्रपति महोदय को देंगी,किसी भी लल्लू-पंजू को नहीं | एक बात और सभी को अपने दिमाग़ के किवाड़ खोलकर बिठा लेनी चाहिए कि सेनाओं का मनोबल देश की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण होता है | तन के समर में मन तो नहीं लड़ सकता,तलवारों को तलवारों से रोका जाता है निहत्थे नहीं | इसपर भी मनोबल महत्वपूर्ण इसलिए है कि मनोबल का अभाव भुजबल को भी क्षीण बनाकर छोड़ता है | सेना का मनोबल जब-जब गिराया गया है तब-तब ग़ज़नवी,क़ासिम और सिकन्दरों के हाथ पिटाई खाई है | एक बात जो बहुत से विवेकशून्य लोगों के दिमाग़ में नहीं पड़ती है कि अहिंसा,अहिंसा का जवाब होती है,हिंसा का नहीं | विश्व के सर्वश्रेष्ठ नीतिकार
(policymaker) योगेश्वर कृष्ण ने कहा था “अहिंसा परमो धर्मः,धर्म हिंसा तथैव च” | मार-काट,डकैत और आतंकवादी भी करते हैं और सैनिक भी | महत्वपूर्ण यह है कि इनमें ऐसा क्या अंतर है कि एक को घृणा से देखा जाता है और दूसरे को सम्मान से
| आतंकवादी वगैरह भी मार-काट करते हैं पर स्वार्थवश,बिना नियम-क़ानून के,इसलिए उन्हें घृणित समझा जाता है | सैनिक मारते-मरते हैं निस्स्वार्थ भाव से,नियमों का अनुपालन करते हुए | जिस प्रकार नियम के अभाव में पर-स्त्री से मैथुन/संतानोत्पत्ति व्यभिचार कहलाता है और नियमपूर्ण होने से नियोग,उसी प्रकार नियमपूर्ण रूप से मारने-मरने वालों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है और सैनिक कहा जाता है और नियमहीन तरीक़े से मारने-मरने वालों को आतंकवादी कहा जाता है |

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सेना और सैनिक का सम्मान अनिवार्य है | यदि सैनिक शत्रु और आम-जन के बीच प्रतिरोधक दीवार बनकर न खड़ा रहे तो साधारण जनों का क्या हाल होगा यह अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं है | भारतीय सैन्यबलों का हर सैनिक अपने लिए या अपने किसी स्वार्थवश सीमाओं पर या अन्य जगहों पर नहीं डटा रहता | वो डटा रहता है उस धरती माता के लिए जो उसके लिए स्वर्ग से भी उत्तम है (जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी) | वो डटा रहता है उन मासूम निहत्थे लोगों के लिए जिनपर शत्रु बिना
कारण हमला करने को आतुर रहता है | जहाँ सैनिक का सम्मान नहीं होता,वह देश अधिक समय तक स्वाधीन नहीं रह सकता |

अन्त में इतना ही अनुरोध करता हूँ अपने राष्ट्र-बन्धुओं से कि सेना का और सैनिक का सम्मान करें और मनोबल क़ायम रखें | किसी भी क्षण यदि सैनिकों को यह लगने लगा कि हमारी सेवाएँ “thankless” हैं और जिनकी सेवा कर रहे हैं वो सब
“ungrateful” हैं,तो यक़ीन मानिए घोर संकट उत्पन्न हो जाएगा | इस संकट को टालिए और सेना का विश्वास और आत्मविश्वास बढ़ाइये |

आपका
प्रभात चतुर्वेदी ‘राजा’

नोट : कहीं भी किसी भी सुरक्षा-बल के जवान को देखें तो एक बार
“धन्यवाद/शुक्रिया/Thank you” अवश्य बोलें |

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